पति की मौत के बाद बच्चों का पेट पालने निकली विधवा की ई-रिक्शा सीज, कॉलेज बस की टक्कर के बाद मिला नहीं मिला न्याय

मुजफ्फरनगर : कहते हैं कि वक्त जब इम्तिहान लेता है तो चारों ओर से मुसीबतें घेर लेती हैं, लेकिन जब रक्षक ही भक्षक बन जाएं या न्याय की उम्मीद ही दम तोड़ दे, तो एक अकेली महिला का संघर्ष और भी कठिन हो जाता है। उत्तर प्रदेश के जनपद मुजफ्फरनगर से एक ऐसी ही मार्मिक कहानी सामने आई है, जहाँ एक विधवा महिला को सिस्टम की संवेदनहीनता का शिकार होना पड़ा।

पति की मौत के बाद संभाली घर की कमान
थाना नई मंडी कोतवाली क्षेत्र के गांव मेघा खेड़ी निवासी धर्मेंद्र की असमय मौत के बाद उनका परिवार दाने-दाने को मोहताज हो गया था। धर्मेंद्र ई-रिक्शा चलाकर अपने मासूम बच्चों और पत्नी का पेट पालते थे। उनकी मृत्यु के बाद जब घर में चूल्हा जलना मुश्किल हुआ, तो उनकी साहसी पत्नी सोनिया तोमर ने आंसुओं को पोंछकर पति का ई-रिक्शा संभाला और शहर की सड़कों पर निकल पड़ीं।
हादसे ने तोड़ी उम्मीद की डोर
सोनिया ई-रिक्शा चलाकर जैसे-तैसे अपने बच्चों की परवरिश कर रही थीं, लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था। एक दिन जब वह काम खत्म कर घर लौट रही थीं, तभी मुजफ्फरनगर के एक प्रतिष्ठित कॉलेज की स्कूल बस ने उनकी ई-रिक्शा में पीछे से जोरदार टक्कर मार दी। इस हादसे में सोनिया को शारीरिक चोटें आईं और उनकी आजीविका का एकमात्र साधन यानी ई-रिक्शा भी पूरी तरह क्षतिग्रस्त हो गया।
पुलिस की संवेदनहीनता: पीड़िता की ई रिक्शा भी कर दी सीज
हैरानी की बात यह रही कि जहाँ पुलिस को एक मजबूर महिला की मदद करनी चाहिए थी और आरोपी बस चालक पर कार्रवाई करनी चाहिए थी, वहाँ खाकी का एक क्रूर चेहरा सामने आया। आरोप है कि पुलिस ने स्कूल बस के साथ साथ बिना किसी गलती के सोनिया की ई-रिक्शा भी सीज कर दी।
”कानून की दुहाई देने वाली पुलिस ने न तो मानवता दिखाई और न ही न्याय। एक विधवा जो पहले से ही आर्थिक तंगी और मानसिक आघात से गुजर रही थी, उसे थाने और अधिकारियों के चक्कर काटने पर मजबूर कर दिया गया।”
हार नहीं मानी: सहेली की मदद से फिर शुरू हुआ संघर्ष
पिछले दो महीनों से सोनिया न्याय की आस में पुलिस अधिकारियों की चौखट पर माथा टेकती रहीं, लेकिन आश्वासन के सिवा कुछ हाथ नहीं लगा। घर में फिर से आर्थिक तंगी हावी होने लगी और मासूम बच्चों का चेहरा देख सोनिया ने एक बार फिर हिम्मत जुटाई।
जब शासन-प्रशासन से उम्मीद टूट गई, तो सोनिया की एक सहेली फरिश्ता बनकर सामने आई। सहेली की मदद से सोनिया ने एक नई ई-रिक्शा निकलवाई है और एक बार फिर मुजफ्फरनगर की सड़कों पर अपनी और अपने बच्चों की किस्मत संवारने के लिए निकल पड़ी हैं।
बड़ा सवाल
सोनिया तोमर का यह संघर्ष समाज और प्रशासन पर कई सवाल खड़े करता है। क्या एक गरीब और मजबूर महिला के लिए न्याय की प्रक्रिया इतनी जटिल है? क्या रसूखदार कॉलेज प्रबंधनों के आगे पुलिस की नैतिकता घुटने टेक देती है? सोनिया ने तो हिम्मत दिखाकर फिर से शुरुआत कर ली है, लेकिन व्यवस्था की इस चोट के निशान शायद कभी नहीं भरेंगे।