सौरम में आयोजित तीन दिवसीय सर्वजातीय सर्वखाप पंचायत के निमंत्रण पत्र का विश्लेषक विजयपाल सिंह ने किया विश्लेषण

सौरम में आयोजित तीन दिवसीय सर्वजातीय सर्वखाप पंचायत के निमंत्रण पत्र का विश्लेषक विजयपाल सिंह ने किया विश्लेषण

इस विश्लेषण में विजयपाल सिंह लिखते हैं कि

1. सर्वप्रथम, ऊपर पहले  चौधरी महेंद्र सिंह टिकैत अमर रहे, बाद में चौधरी कबूल सिंह जी का नाम? सर्वखाप पंचायत की श्रृंखला में पहले कबूल सिंह जी और बाद में सुभाष बालियान जी है। महेंद्र सिंह टिकैत जी का यहां नाम किस संदर्भ में है ?.. यह पंचायत सर्व खाप की है या बालियान खाप की ?..
2. पंचायत के मुद्दो की भाषा गोल-मोल-कुछ justification नहीं आ रहा है कि समाज किस तरह इन चीजों से त्रस्त है, क्यों इनकी आवश्यकता आन पड़ी है और पंचायत के माध्यम से करना क्या चाहते हैं, मंजिल क्या है, समाज को कहां लेकर जाना चाहते हैं? कौन गणमान्य वक्ता आमन्त्रित किये गये है ? किस आदर्श के तहत संवाद होंगे  ?
3. सम्पर्क सूत्रों पर मेरी कोई विशेष टिप्पणी नही है, सिवाय इसके कि गौरव टिकैत ने किस अधिकार से स्वयं को टिकैत लिखा है  ?
4. निमंत्रण सुभाष बालियान जी की तरफ से होना चाहिए था और वही आयोजनकर्ता भी हो सकते हैं, फिर राकेश किस अधिकार से आ टपके है? वह स्वयं को किसान यूनियन के प्रवक्ता बता रहे हैं तो सर्व खाप पंचायत का किसान यूनियन से क्या सम्बन्ध है? वह टिकैत टाईटल किस अधिकार से प्रयोग कर रहे हैं ?
5. नरेश टिकैत किस अधिकार से अपना नाम डाल रहे हैं? वह एक आमन्त्रित सदस्य तो हो सकते हैं। निमंत्रण भेजने वालो में उनका नाम कैसे आ गया  ?
ये सारे सवाल कहीं न कहीं इस सभा के छुपे ऐजंडे की तरह इशारा ज्यादा कर रहे हैं जो बताया जा रहा है वह कमजोर पड़ रहा है। जिस तरह एक ही परिवार इस पम्पलेट में छाया हुआ है, वह पूरी पंचायत के एजेंडे पर सवाल खड़े कर रहा है।

नीचे दिया गया लेख पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जाट खापों के बीच द्वंद्व के मध्य लिखा गया है। कृपया उसी परिप्रेक्ष्य में पढ़ें।

खाप पंचायतें: अपेक्षाएं व वास्तविकतायें

लेखक – विजय पाल सिंह

खाप पंचायतें समाज में बहुत प्राचीन काल से विद्यमान है, लगभग सातवीं सदी AD से। “मेंरठ डिविजन”की खाप का इतिहास भी तेरहवीं सदी से उपलब्ध है । इन खाप पंचायतों ने समाज को बहुत लम्बे समय तक एक सूत्र में बांध कर रखने का कार्य किया है। एक लोकपाल के तौर पर ये खाप पंचायते समाज की प्रहरी बन कर खड़ी रही हैं। आज के युग में इनकी कानूनी sanctity न होने के बावजूद भी समाज में इनकी स्वीकार्यता इनकी महत्ता को दर्शाती है। मगर आज बाजारवाद व शिक्षा के प्रसार के दौर में खाप पंचायतों का वह रूतबा कम हुआ है। आर्थिक स्थिति व कुछ हद तक पंचायतों के पदाधिकारियों की अकर्मण्यता भी एक हद तक वर्तमान स्थिति के लिए जिम्मेदार हैं। जबकि पहले वक्त के मुकाबले आज इन पंचायतों की समाज को ज्यादा जरूरत है। शिक्षा के प्रसार व बाजारवाद के दौर में आज समाज ऐसी दहलीज पर खड़ा है कि पुराने संस्कार व नैतिकताएं कमजोर पड़ी है जबकि नयी मान्यताओं व संस्कारों का जन्म व उनमें स्थायित्व आना बाकी है। ऐसे हालातों में खाप पंचायतों का रोल बहुत अहम हो गया है।
इन पंचायतों के पदाधिकारियों की अकर्मण्यता को भी पहचानना जरूरी है। कुछ तो शिक्षा व जागरूकता के अभाव में तथा कुछ आर्थिक समस्याओं के चलते भी खाप पंचायतों के पदाधिकारी अपनी सामाजिक जिम्मेदारियों को निभाने में शिथिल हो गये है। ऐसे हालातों में समाज के जिम्मेदार नागरिकों को व्यक्तिगत व सामूहिक तौर से खाप पंचायतों को पुनर्गठित और पुनर्जीवित करने को आगे आने की आवश्यकता है।
समाज में खाप पंचायतों की अहमियत व जिम्मेदारियों को समझना और पहचानना होगा।
खाप पंचायतों के पदाधिकारियों का एक ही परिवार से पीढ़ी दर पीढ़ी बने रहने का रिवाज समाज में है। समझना होगा कि योग्यता व संस्कार किसी एक ही परिवार में चलते रहे, इसके अपवाद समाज में भरपूर मात्रा में मौजूद हैं। अतः इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए जहां कहीं आवश्यक हो पंचायतों के नये पदाधिकारियों को अस्थाई या स्थाई तौर पर किसी दूसरे संस्कारी परिवार से चुनने में कोई झिझक नहीं होनी चाहिए। अगर कोई परिवार या व्यक्ति अपने पद की किन्हीं कारणों से जिम्मेदारी पूरी नहीं कर पा रहा है तो या तो उसे स्वयं पद छोड़ देना चाहिए या फिर समाज को मिलकर इस विषय पर आवश्यक कदम उठाने चाहिए। मगर इन पदों को साज-सज्जा का साधन बनने से हर सूरत में रोका जाना चाहिए।
आर्थिक पहलू भी उतना ही महत्वपूर्ण है। इस सच्चाई को हम जितना जल्दी समझ लें, उतना अच्छा है। एक पदाधिकारी को पूर्ण रूपेण अपनी सामाजिक ज़िम्मेदारियां निर्वहन करने के लिए एक अच्छे-भले सम्पन्न परिवार की पूरी आमदनी के बराबर धन की जरूरत पड़ती हैं। शादी-ब्याह, सुख-दुख, मीटिंग, पंचायतें, सामाजिक मुद्दों पर पहल, आना-जाना, इस तरह के ढेर सारे ऐसे मामले है जो इन सामाजिक प्रतिनिधियों को attend करने पड़ते हैं। यह कहां तक सम्भव है कि एक व्यक्ति इन सब जिम्मेदारियों का बोझ अपने परिवार पर डाले, नहीं है। अतः आवश्यकता इस बात की है कि खाप पंचायतों के पदाधिकारियों के regular आमदनी के स्रोत तैयार होने चाहिए ताकि उनकी आर्थिक मामलों में अपने परिवार पर निर्भरता समाप्त हो और वे आजादी से अपने सामाजिक दायित्वों को पूरा कर पाएं।
आज खाप पंचायतें समाज में सक्रिय (proactive) भूमिका अदा नहीं कर पा रही है। ये पंचायतें एक दर्शक की भूमिका में ज्यादा दिखाई दे रही है।
खाप पंचायतें सामाजिक व राजनीतिक प्रक्रियाओं के बीच भी अन्तर नहीं कर पा रही है। विशेषतया, किसान आंदोलन और खाप पंचायतों के परिप्रेक्ष्य मे तो यह पूर्णतया सत्य है।
खाप पंचायतों का आज के दौर में जो विरोध चल रहा है वह वास्तव में खाप पंचायतों का विरोध नहीं है, वह विरोध खाप पंचायतों का चोला ओढ़कर छुपे हुए एजेंडे पूरे करने की चालों का विरोध है। जिसे समझ सब रहे हैं मगर उचित भाषा के माध्यम से स्पष्ट नहीं कर पा रहे हैं।
खाप पंचायतों के सिरमौर हमारे इलाके से सर्वखाप मंत्री है जो आज के वक्त में श्री सुभाष बालियान जी है। उन्हीं के कंधे पर रखकर यह तथाकथित सर्वखाप पंचायत बुलाई जा रही है मगर पम्पलेट, जो इस विषय में प्रकाशित किया गया है, वह कुछ और ही कहानी कह रहा है। पम्पलेट की भाषा हर किसी को समझ रही है। उसके पीछे का छुपा ऐजंडा भी हर किसी को समझ आ रहा है, सिवाय सुभाष बालियान और नरेश टिकैत के।अब वर्ग दो है- एक वर्ग वह है जिसे अंधे होकर टिकैत परिवार का बाजा बजाना है और दूसरा वर्ग वह है जो fainess की मांग कर रहा है। Fairness की मांग अगर पूरी होती है तो टिकैत परिवार का पूरा का पूरा एजेंडा फेल होता है, जिसे टिकैत परिवार कभी भी मंजूर नहीं करेगा । उसके लिए धृतराष्ट्र को सिंहासन छोड़ने तक की हिम्मत होनी चाहिए। मगर महाभारत को यहां पर दोहराया जाना है। सिंहासन नहीं छूटेगा, खापों में दरार पड़े तो पड़े। आपसी सामंजस्य टूटे तो टूटे। उस मादे को प्रदर्शित करने की दूर-दूर तक कोई सम्भावना यहां नहीं है।
नरेश टिकैत का यह रोल आज स्वयं नरेश टिकैत को और “शक्ति प्रदर्शन” में शामिल होने वाले समाज के एक बड़े वर्ग को दिखाई न दे रहा हो मगर इतिहास इसका निर्णय जरुर करेगा, जैसे हमेशा करता आया है।
राकेश को अपनी राजनीति करनी है, लांख करें, आधी दुनिया करती है। एक आम आदमी का दर्द तो यह है कि वह यह राजनीति कभी बालियान खाप के कंधे पर बैठकर, अपने आपको राकेश “टिकैत” बोलकर, तो कभी सर्वखाप पंचायत के कंधे पर बैठकर कर रहे हैं।
अपराधी पहले नरेश टिकैत है – टिकैत टाईटल की बंदरबांट कराकर। आज राकेश की शादी सुदा बेटी ज्योति भी अपने आप को “टिकैत” लिखती है, इनके छोटे भाई चरणसिंह भी अपने आपको “टिकैत” लिखते है। और तो और इनके घर के 10-10 साल के बच्चे भी “टिकैत” बनकर facebook पर आ रहे हैं। “टिकैत” टाईटल की बंदरबांट के जिम्मेदार केवल और केवल नरेश टिकैत है। “टिकैत” टाईटल बालियान खाप के चौधरी का टाईटल है, न कि एक परिवार या एक मुहल्ले का या उनके रिश्तेदारों का।
इस श्रृंखला में दूसरा अपराध किया है सुभाष बालियान जी ने। वह सर्वखाप पंचायत का प्लेटफार्म इनको पकड़ाकर अलग बैठ गये। क्या मजबूरी थी, कौन सी आपके गर्दन पर तलवार चल रही थी कि आपने अपने पद की गरिमा ही नहीं समझी? जिस पम्पलेट को इन लोगों ने प्रकाशित किया है उसमें टिकैत परिवार छाया हुआ है। सुभाष बालियान जी या तो इतने नादान है कि कुछ समझते ही नहीं या कमजोर, यह फैसला वह खुद ही करें।
ऐसा भी नहीं है कि यह पंचायत बालियान खाप द्वारा नहीं बुलायी थी सकती थी। अगर कोई एजेंडा था ही मन में, छुपा हुआ या fair, अपने बल, बालियान खाप के बैनर तले सर्वखाप पंचायत बुलाते, सफलता और असफलता के जिम्मेदार भी बनते।
जितना सुननें में आया है इस तथाकथित खाप पंचायत का मुख्य मुद्दा बताया जा रहा है, पेड़ लगाना, मृत्यु भोज पर पाबंदी और दहेज़ में कार के बजाय ट्रैक्टर ले लेना-किस दुनिया में रह रहे हैं ये प्रवक्ता। इनके कहने कौन यह कार्य करने लग जायेगा, किसे मूर्ख बना रहे हो, किस दुनिया में रह रहे हो?
अगर हम पश्चिमी उत्तर प्रदेश के संदर्भ में ही देखें तो इस इलाके मे ढेर सारे ऐसे मुद्दे हैं जिन पर बहुत पहले से ही काम शुरू हो जाना चाहिए था। बल्कि कहना चाहिए कि वही ऐसे मुद्दे थे जिन पर ही काम होना चाहिए था। हम एक-एक करके उन पर विचार करते हैं।
1. पश्चिमी उत्तर प्रदेश की तीन नदियां, काली नदी, जो मुजफ्फरनगर के पास से बहती है, हिंडन नदी व कृष्णी नदी जिनमें करीब 30 साल पहले तक भरपूर मात्रा में पानी बहा करता था, आज मृत प्रायः और नाले बन चुकी है। नदी के बेसिन को आस-पास के किसानों ने घेर लिया है। अगले तीस सालों के बाद पैदा होने वाले बच्चे किताबों में पढ़ा करेंगे कि वहां पर कोई नदी हुआ करती थी और नदी से होने वाले लाभों से भी वे वंचित रहेंगे। इस मुद्दे को उठाने का काम यह खाप पंचायतें कर सकती थी और पर्यावरण बचाव में एक बड़ा योगदान कर सकती थी। मगर ऐसा हो नहीं सका।
2. हमारी बाकी नदियों का जल स्तर भी लगातार गिर रहा है। भूजल का दोहन जबरदस्त तरीके से हो रहा है। पिछले करीब ३०-५० सालों में ही भूजल ६० फीट से गिरकर २२० फीट पर पहुंच गया है। अगर यही स्थिति चलती रही तो अगले २५-३० सालों में जल के मामले में हम राजस्थान के स्तर पर पहुंच जायेंगे। उस वक्त की हमारी संतति हमारा किस तरह से मूल्याकंन करेगी, हमे सोचकर भी डरना चाहिए। पर्यावरणविद भविष्यवाणियां कर रहे हैं कि अगले २५-३० सालों में गंगा जैसी बड़ी नदियां भी सूखने के कगार पर पहुंच जायेगी। इन डरों के मध्य खाप पंचायतों के लिए उचित था कि समाज के स्तर पर या सरकारी स्तर पर जागरूकता पैदा करके सिंचाई की नई विधियों ( fountains )को आम आदमियों के बीच popular बनाया जाता और जल conservation में खाप पंचायतें अपना योगदान देती। नयी फसलों को ईजाद कराया जाता। सरकार के साथ तथा समाज के बीच संवाद स्थापित किया जाता, सहमतियां बनायी जाती। और कारगर कदम उठाए जाते।
3.उत्तर भारत में पूसा व पन्तनगर दो बड़ी कृषि विश्वविद्यालय है जिनमें उन्नत किस्म के बीज व जैविक खाद (organic fertilizer)किये जाते है। दोनों ही विश्वविद्यालयों के पश्चिमी यूपी में कोई local outlet उपलब्ध नहीं है। जैविक खाद तो इतने सस्ते हैं कि लगभग ५०-५५ रूपये की बोतल एक एकड़ के खेत के लिए काफी होती है। इनके प्रयोग में समस्या यह है कि किसानों को न तो इनका ज्ञान है और न ही ये सुलभ तरीके से प्राप्त है।
4. राजस्थान में भूजल एक समस्या है। मगर वहां के किसानों ने उसका समाधान यह निकाला कि उन्होंने बेर, खरबूजे व अमरूद की खेती को अपना लिया है और आज राजस्थान में बड़े ही उन्नत किस्म का बड़ा बेर पैदा हो रहा है। उस बेर की जाति के सामने सारे बेर फेल है। बागपत जो खरबूजे के लिए प्रसिद्ध हुआ करता था, वहां अब कोई खरबूजा पैदा नहीं होता मगर राजस्थान के लाल खरबूजे ने सारे उत्तर भारत में प्रसिद्ध है। यही हालत अमरूद की भी है। उत्तर भारत के बाजार से इलाहाबाद को राजस्थान के अमरूद ने बाजार से हटा दिया है । अब अमरूद के बाजार पर अब राजस्थान के अमरूद का कब्जा है। राजस्थान की इन मिसालों में कोई सरकारी योगदान नहीं है बल्कि ये किसानों की अपनी जागरूकता के परिणाम है।
5 – यही हाल पश्चिमी उत्तर प्रदेश की शिक्षा संस्थाओं का है। पुरानी समृद्ध शिक्षण संस्थायें-बडौत का जाट कालेज, शामली का किसान कालेज, खुद सिसौली का जनता कालेज और डी ए वी कालेज, लालू खेड़ी का डी ए वी कालेज, मुजफ्फरनगर के कालेज, ये सब वे नाम है जिनका अपने वक्त पर नाम था और जहां से हम तथा हमसे पहली संततियां पढ़कर निकली थी तथा शिक्षा के अपने उद्देश्यों में उन्होंने अपने मुकाम हासिल किए थे। ये सभी संस्थाएं आज अपनी आखिरी सांसें गिन रही और उनके स्थान नयी दुकान रुपी संस्थाओं ने ले लिए हैं। अब आपको मौहम्मदपुर राय सिंह के मिडिल स्कूल में इतिहास व भूगोल पढ़ाने वाले कन्हैयालाल, अंग्रेजी व गणित के बाबूराम, जाट कालेज बड़ौत के कटार सिंह राणा, कटार सिंह मलिक, मनोविज्ञान के जगत सिंह राणा, जैन कालेज बड़ौत के डा. बीर सिंह व अंग्रेजी के शौबीर सिंह या उनके प्रतिनिधि कहीं देखने को नहीं मिलेंगे। इस अकाल के लिए हर सब जिम्मेदार हैं।
6. पश्चिमी उत्तर प्रदेश के वकील करीब ४० सालों से हाई कोर्ट की पश्चिमी उत्तर प्रदेश में ब्रांच के लिए अकेले संघर्षरत हैं। बाकी को कोई मतलब नहीं है। क्या यह समाज का एक सामूहिक मुद्दा नहीं होना चाहिए था?
7. पश्चिमी उत्तर प्रदेश को हरित प्रदेश बनाने की मांग पर कुछ लोगों के व्यक्तिगत प्रयत्न थककर रह गये, कोई रंग नहीं ला पाए, उम्मीद भी नहीं की जा सकती थी, क्योंकि ये मुद्दा बड़ा था। मगर उत्तराखंड का उदाहरण हमारे सामने है। एक ही झटके में रामपुर तिराहे, मुजफ्फरनगर, में उत्तराखंड के लोगों ने अपनी conviction इस मुद्दे पर साबित कर दी थी और बहुत ही कम समय में उत्तराखंड अस्तित्व में आ गया था।
8. अगर केवल सामाजिक मुद्दों को ही ले लिया जाए तो राजस्थान की गुर्जर जाति ने अपने यहां मृत्यु भोज बंद कर दिया है। कुछ समाजो में दहेज पर भी प्रतिबंध लगे हैं मगर पश्चिमी उत्तर प्रदेश में ऐसा कोई कदम उठना तो दूर ये विषय कभी discussion का मुद्दा भी नहीं बन पाए।
9. गुजरात की पटेल community ने अपनी community के वक्त के त्रस्त परिवारों के सहायतार्थ एक बहुत विशाल फंड बनाया है, जो ऐसे परिवारो की आर्थिक सुरक्षा सुनिश्चित करेगा। इतना विशाल कि सन् २००० में उस फंड को इकट्ठा करने वाला रथ केवल न्यूयॉर्क, अमेरिका तक पहुंचते-पहुंचते पांच हजार करोड़ रुपए इकट्ठे कर चुका था। वह रथ पटेल community के अमेरिका व इंग्लैंड के प्रवासी गुजरातियों से ऐच्छिक दान इकट्ठा कर रहा था ।
10. पश्चिमी उत्तर प्रदेश के सभी गांवों आज ८-१० कैंसर के मरीज हर गांव में देखें जा सकते हैं। Chemicals का fertilizer के तौर पर अत्यधिक प्रयोग, और अन्य भी कारण हो सकते हैं, पर मुद्दा है कि कैंसर की बीमारी भयानक रूप बढ़ी हुई है। इलाज महंगा और इलाज की उपलब्धता भी आसान नहीं है। जितना पैसा इस आंदोलन के सूत्रधार पश्चिमी उत्तर प्रदेश से इकट्ठा कर चुके हैं उससे आराम से एक हस्पताल खड़ा किया जा सकता जो इस इलाके लोगों के लिए एक वरदान साबित होता मगर ऐसा नहीं हुआ और वह सारा धन व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं की बलि चढ़ गया।
11. हर गांव के कौने पर शराब के सरकारी ठेके खुल चुके हैं। जो चल भी रहे हैं पनप भी रहे। उस शराब के उपभोक्ता उसी समाज के व्यक्ति हैं जिनकी दो गुनी आमदनी की पैरवी दिल्ली के बार्डरों को रोककर की जा रही है। जिनमें से बहुत सारे परिवार इस शराब की बलि चढ़ रहे है। उन शराब के ठेकों के खिलाफ कोई आवाज समाज में नहीं उठी है।
12. पश्चिमी उत्तर प्रदेश के गांव-छोटा भौंरा, मुजफ्फरनगर, बुलंद शहर का गांव, शहद पुर, सूबे दिल्ली के मितराउ तथा दिचाउ कला ऐसे उदाहरण है जहां आपसी दुश्मनी मे परिवार के परिवार खप गये है मगर इतने बड़े मामले कभी खाप पंचायतों के ध्यान नहीं खीच पाए। इनको केवल कानून-व्यवस्था का मुद्दा मान लिया गया।
अगर इस परिप्रेक्ष्य में देखे तो हमें अपना समाज वस्तुत: एक जंगल की परिकल्पना पर आधारित समाज दिखता है। जहां का खाप पंचायत नामक माली नदारद है। वह माली अगर कभी दिखाई भी देता है तो वह वक्त की आवश्यकता से बहुत पीछे दिखाई देता है। इसीलिए इस विषय पर गम्भीर चिन्तन की आवश्यकता है। जागरुक व्यक्तियों, सक्षम व्यक्तियों, चिंतनशील व्यक्तियों के लिए यह एक परीक्षा जैसी घड़ी है, कि वे इस स्थिति से उनका मानस कितना हिल पाता हैं और कितना कथित रूप से चल रहे तथाकथित युध के पक्ष या विपक्ष के धड़ों में पड़ने के बजाय इस स्थिति को विहंगम दृष्टि (bird eye view) से देखकर आगे आ पाते हैं और इन मूल्यों के हिसाब से समाज को दिशा देने काम कर पाते हैं।
13. संस्कारों ध्वस्त करने के सारे साधन उपलब्ध है – किसान यूनियन भी है, शराब भी है, भृमित करने नेता भी है। मगर संस्कार पैदा करने का कार्य भगवान के भरोसे पर छोड़ा हुआ है।
मेरी दृष्टि में यही है आज की इस खाप पंचायतों का असली चेहरा। और अपेक्षाओं और वास्तविकताओं का अन्तर।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *